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Friday, February 16, 2024

Ramcharit manas part-2

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*🚩🌹 भाग - 2  🚩🌹*


*🚩🕉️रामचरित मानस : कैकेयी निंदा की पात्र है या वंदना की*



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*🚩🕉️राम के वन गमन के पश्चात् भी कैकेयी भरत के लिए भी यही चाहती थी कि वह राजसिंहासन पर बैठ कर राज्य का संचालन न करे और य़ही हुआ। भरत ने राज कार्य तो संभाला लेकिन राजसिंहासन धारण न कर सिंहासन पर राम की चरण पादुका स्थापित कर राज्य का शासन कुशासन पर बैठ कर संचालित किया।*

 

*🚩🕉️भरत ने कुशासन पर बैठ कर अयोध्या को सुशासन दिया। संत का मानना है कि राम की चौदह साल की वनवास की अवधि मे एक भी मौत नहीं हुई।* 

 

*🚩🕉️इतनी ज्ञानवान और गुणवान और राम को भरत से भी अधिक प्रेम करने वाली कैकेयी ने कुटिल मंथरा के बहकावे में कैसे आ गई।*

 

*🚩🕉️संत का कहना था कि आप मानस का गंभीरता के साथ अध्ययन करें, मानस का सिर्फ परायण ही पर्याप्त नहीं है। मंथरा की कुटिल बातें सुन कर कैकेयी ने क्या कुछ नहीं कहा ‘पुनि अस कबहुँ कहसी घरफोरि, तब धरि जीभ कढ़ावहु तोरि’ और फिर तुलसी ने एक दोहे कैकेयी के मुख से यह कहलवाया “काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि, तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।*

 

*🚩🕉️इसके अलावा कैकेयी के चरित्र के संदर्भ कोई राय बनाने के पूर्व देवताओं और सरस्वती की भूमिका पर भी तो विचार किया जाना चाहिए। यह प्रसंग रामायण का थोड़ा भी ज्ञान रखने वाले सबको ज्ञात है इसलिए दोहराने की आवश्यकता नहीं।*


*🚩🕉️ऐसी परिस्थिति से घिर कर ही तो कैकेयी को ऐसे दो वरदान मांगने पड़े जिनके चलते वह हर काल और युग में एक कलंकिनी के रुप मे ही परिभाषित होती रही। अपने जिस पुत्र भरत के लिए राज्य मांगा उसी पुत्र से कैकेयी को कितनी लांछना भोगनी पड़ी यथा ....*

 

*🚩🕉️जौ पै कुरुचि रही अति तोहि, जनमत काहे न मारे मोहि। भरत ने अपनी माता के प्रति जैसे कुवचन पापिनि सबहिं भांति कुल नासा .... कहे उनको भी कैकेयी रघुवंश की सुरक्षा के लिए सहन कर गई। भरत ने इस चौपाई में तो एक मां के प्रति वांछित किसी मर्यादा का ख्याल नहीं रखा .......*

 

*🚩🕉️जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ, खंड खंड होई हृदउ न गयऊ ।।*

*बर मागत मन भइ नहिं पीरा, गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ।।*

 

*इन शब्दों  में भरतजी कैकेयी की घोरतम निंदा करते हैं। भगवान राम ने भरतजी को चित्रकूट में कैकेयी की इस तरह कठोरतम निंदा करने रोका तो भरतजी ने कहा कि मैं अकेला कैकेयी की निंदा नहीं कर रहा हूं बल्कि ‘जननी कुमति जगतु सबु साखी’’ यहां तक कि निषादराज की दृष्टि में भी कैकेयी का चरित्र भी ऐसा ही है .... यथा*

 

*🚩🕉️कैकेयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनुकीन्ह*

 

*🚩🕉️लेकिन श्रीराम इस तरह के किसी मत से सहमत नहीं जान पड़ते।*


*🚩🕉️राम कहते हैं “ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई , जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई*

 

*🚩🕉️मानस का गहन अध्ययन करने पर यही कहना पड़ता है कि कैकेयी निंदनीया है या वंदनीया इस पर मंतव्य देना कोई आसान नहीं है।*

 

*🚩🕉️क्योंकि कैकेयी की प्रसंशा करने वाला तुलसी का पात्र इतना महान है कि अनुचित नहीं माना जा सकता और वह पात्र है मानस का महा नायक राम। दूसरी ओर कैकेयी की निंदा करने वाले हैं भरत और उनका चरित्र भी इस तरह चित्रित किया गया है कि हम यह नहीं कह सकते कि वे गलत हैं।*

 

*🚩🕉️कुल मिला कर रामायण में परिस्थितियां इस तरह रची गई है कि तुलसी ने मूर्त रुप से भले ही निंदनीया के रुप में प्रस्तुत किया है लेकिन कैकेयी के दो वरदान के परिणामों पर जाए तो वे वंदनीया ही हैं।* 

 

*🚩🕉️मैथिली

 के शब्दों मे स्वयं कैकेयी स्वीकार करती है---*

 

*“🚩🕉️क्या कर सकती थी मरी मंथरा दासी, मेरा मन ही रह सका ना निज विश्वासी”।*


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