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Tuesday, February 20, 2024

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

 श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥


श्रवण , कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन,वंदन,, दास्य, सख्य, और आत्मनिवेदन - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं ।



श्रवण---( परीक्षित)

           ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्त्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।


कीर्तन---(  शुकदेव)

         ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।


स्मरण---(प्रह्लाद)

          निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।


पाद सेवन----(लक्ष्मी)

       ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना।


अर्चन-----(पृथुराजा)

              मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।


वंदन-----(अक्रूर)

         भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।


दास्य----( हनुमान)

          ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।


सख्य----(अर्जुन) 

            ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।


आत्म निवेदन----(बलि राजा)

                 अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं।


भगवान की नौ तरह से भक्ति के नाम और व्यावहारिक अर्थ ----


1-प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । 

    

संतो का सत्संग - 

                   संत यानि सज्जन या सद्गुणी की संगति।


2-दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।

    

ईश्वर के कथा-प्रसंग में प्रेम - 

                            देवताओं के चरित्र और आदर्शों का स्मरण और जीवन में उतारना।


3- गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।

      

अहं का त्याग - 

                  अभिमान, दंभ न रखना। क्योंकि ऐसा भाव भगवान के स्मरण से दूर ले जाता है। इसलिए गुरु यानि बड़ों या सिखाने वाले व्यक्ति को सम्मान दें।


4- चौथी भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।

  

कपट रहित होना -

            दूसरों से छल न करने या धोखा न देने का भाव।


5.मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। 

   पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥

  

ईश्वर के मंत्र जप - 

              भगवान में गहरी आस्था, जो इरादों को मजबूत बनाए रखती है।


6. छठ दम सील बिरति बहु करमा । 

   

इन्द्रियों का निग्रह -

             स्वभाव, चरित्र और कर्म को साफ रखना।


7.सातवँ सम मोहि मय जग देखा ।


प्रकृति की हर रचना में ईश्वर देखना - 

                                दूसरों के प्रति संवेदना और भावना रखना,भेदभाव, ऊंच नीच से परे रहना।


8. आठवँ जथालाभ संतोषा।

     सपनेहूँ नहिं देखइ परदोषा।।


संतोष रखना और दोष दर्शन से बचना - 

                          जो कुछ आपके पास है उसका सुख उठाएं। अपने अभाव या सुख की लालसा में दूसरों के दोष या बुराई न खोजें। इससे आपवैचारिक दोष आने से सुखी होकर भी दु:खी होते है। जबकि संतोष और सद्भाव से ईश्वर और धर्म में मन लगता है।


9.नवम सरल सब सन छलहीना ।

     मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥


ईश्वर में विश्वास - 

                    भगवान में अटूट विश्वास रख दु:ख हो या सुख हर स्थिति में समान रहना, स्वभाव को सरल रखना यानि किसी के लिए बुरी भावना न रखना, धार्मिक दृष्टि से स्वभाव, विचार और व्यवहार में इस तरह के गुणों को लाने से न केवल ईश्वर की कृपा मिलती है बल्कि सांसारिक सुख-सुविधाओं का भी वास्तविक आनंद मिलता है।

Friday, February 16, 2024

Ramcharit manas part-2

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*🚩🌹 भाग - 2  🚩🌹*


*🚩🕉️रामचरित मानस : कैकेयी निंदा की पात्र है या वंदना की*



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*🚩🕉️राम के वन गमन के पश्चात् भी कैकेयी भरत के लिए भी यही चाहती थी कि वह राजसिंहासन पर बैठ कर राज्य का संचालन न करे और य़ही हुआ। भरत ने राज कार्य तो संभाला लेकिन राजसिंहासन धारण न कर सिंहासन पर राम की चरण पादुका स्थापित कर राज्य का शासन कुशासन पर बैठ कर संचालित किया।*

 

*🚩🕉️भरत ने कुशासन पर बैठ कर अयोध्या को सुशासन दिया। संत का मानना है कि राम की चौदह साल की वनवास की अवधि मे एक भी मौत नहीं हुई।* 

 

*🚩🕉️इतनी ज्ञानवान और गुणवान और राम को भरत से भी अधिक प्रेम करने वाली कैकेयी ने कुटिल मंथरा के बहकावे में कैसे आ गई।*

 

*🚩🕉️संत का कहना था कि आप मानस का गंभीरता के साथ अध्ययन करें, मानस का सिर्फ परायण ही पर्याप्त नहीं है। मंथरा की कुटिल बातें सुन कर कैकेयी ने क्या कुछ नहीं कहा ‘पुनि अस कबहुँ कहसी घरफोरि, तब धरि जीभ कढ़ावहु तोरि’ और फिर तुलसी ने एक दोहे कैकेयी के मुख से यह कहलवाया “काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि, तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।*

 

*🚩🕉️इसके अलावा कैकेयी के चरित्र के संदर्भ कोई राय बनाने के पूर्व देवताओं और सरस्वती की भूमिका पर भी तो विचार किया जाना चाहिए। यह प्रसंग रामायण का थोड़ा भी ज्ञान रखने वाले सबको ज्ञात है इसलिए दोहराने की आवश्यकता नहीं।*


*🚩🕉️ऐसी परिस्थिति से घिर कर ही तो कैकेयी को ऐसे दो वरदान मांगने पड़े जिनके चलते वह हर काल और युग में एक कलंकिनी के रुप मे ही परिभाषित होती रही। अपने जिस पुत्र भरत के लिए राज्य मांगा उसी पुत्र से कैकेयी को कितनी लांछना भोगनी पड़ी यथा ....*

 

*🚩🕉️जौ पै कुरुचि रही अति तोहि, जनमत काहे न मारे मोहि। भरत ने अपनी माता के प्रति जैसे कुवचन पापिनि सबहिं भांति कुल नासा .... कहे उनको भी कैकेयी रघुवंश की सुरक्षा के लिए सहन कर गई। भरत ने इस चौपाई में तो एक मां के प्रति वांछित किसी मर्यादा का ख्याल नहीं रखा .......*

 

*🚩🕉️जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ, खंड खंड होई हृदउ न गयऊ ।।*

*बर मागत मन भइ नहिं पीरा, गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ।।*

 

*इन शब्दों  में भरतजी कैकेयी की घोरतम निंदा करते हैं। भगवान राम ने भरतजी को चित्रकूट में कैकेयी की इस तरह कठोरतम निंदा करने रोका तो भरतजी ने कहा कि मैं अकेला कैकेयी की निंदा नहीं कर रहा हूं बल्कि ‘जननी कुमति जगतु सबु साखी’’ यहां तक कि निषादराज की दृष्टि में भी कैकेयी का चरित्र भी ऐसा ही है .... यथा*

 

*🚩🕉️कैकेयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनुकीन्ह*

 

*🚩🕉️लेकिन श्रीराम इस तरह के किसी मत से सहमत नहीं जान पड़ते।*


*🚩🕉️राम कहते हैं “ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई , जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई*

 

*🚩🕉️मानस का गहन अध्ययन करने पर यही कहना पड़ता है कि कैकेयी निंदनीया है या वंदनीया इस पर मंतव्य देना कोई आसान नहीं है।*

 

*🚩🕉️क्योंकि कैकेयी की प्रसंशा करने वाला तुलसी का पात्र इतना महान है कि अनुचित नहीं माना जा सकता और वह पात्र है मानस का महा नायक राम। दूसरी ओर कैकेयी की निंदा करने वाले हैं भरत और उनका चरित्र भी इस तरह चित्रित किया गया है कि हम यह नहीं कह सकते कि वे गलत हैं।*

 

*🚩🕉️कुल मिला कर रामायण में परिस्थितियां इस तरह रची गई है कि तुलसी ने मूर्त रुप से भले ही निंदनीया के रुप में प्रस्तुत किया है लेकिन कैकेयी के दो वरदान के परिणामों पर जाए तो वे वंदनीया ही हैं।* 

 

*🚩🕉️मैथिली

 के शब्दों मे स्वयं कैकेयी स्वीकार करती है---*

 

*“🚩🕉️क्या कर सकती थी मरी मंथरा दासी, मेरा मन ही रह सका ना निज विश्वासी”।*


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