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Friday, March 8, 2024

शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी ?

 🌹 *शिव प्रतिमा के सामने ही क्यों विराजित होते है नंदी ?* 🌹






शिलाद मुनि के ब्रह्मचारी हो जाने के कारण वंश समाप्त  होता देख उनके पितरों ने अपनी चिंता उनसे व्यक्त की . मुनि योग और तप आदि में व्यस्त रहने के कारण गृहस्थाश्रम नहीं अपनाना चाहते थे . 


शिलाद मुनि ने संतान की कामना से इंद्र देव को तप से प्रसन्न कर जन्म और मृत्यु से हीन पुत्र का वरदान माँगा . परन्तु इंद्र ने यह वरदान देने में असर्मथता प्रकट की और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कहा .


भगवान शंकर शिलाद मुनि के कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं शिलाद के पुत्र रूप में प्रकट होने का वरदान दिया और नंदी के रूप में प्रकट हुए . शंकर के वरदान से नंदी मृत्यु से भय मुक्त , अजर अमर और सुखी हो गया . भगवान शंकर ने उमा की सम्मति से संपूर्ण गणों , गणेशों व वेदों के समक्ष गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया . 


इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गए . बाद में मरुतों की पुत्री सुयशा के साथ नंदी का विवाह हुआ . भगवान शंकर ने नंदी को वरदान दिया कि जहाँ पर नंदी का निवास होगा वहाँ उनका भी निवास होगा . तभी से हर शिव मंदिर में शिवजी के सामने नंदी की स्थापना की जाती है .


*नंदी के दर्शन और महत्व*


नंदी के नेत्र सदैव अपने इष्ट को स्मरण रखने का प्रतीक हैं , क्योंकि नेत्रों से ही उनकी छवि मन में बसती है और यहीं से भक्ति की शुरुआत होती है . नंदी के नेत्र हमें ये बात सिखाते हैं कि अगर भक्ति के साथ मनुष्य में क्रोध , अहम व दुर्गुणों को पराजित करने का सामर्थ्य न हो तो भक्ति का लक्ष्य प्राप्त नहीं होता .


नंदी के दर्शन करने के बाद उनके सींगों को स्पर्श कर माथे से लगाने का विधान है . माना जाता है इससे मनुष्य को सद्बुद्धि आती है , विवेक जाग्रत होता है। नंदी के सींग दो और बातों का प्रतीक हैं . वे जीवन में ज्ञान और विवेक को अपनाने का संंदेश देते हैं . 


नंदी के गले में एक सुनहरी घंटी होती है . जब इसकी आवाज आती है तो यह मन को मधुर लगती है . घंटी की मधुर धुन का मतलब है कि नंदी की तरह ही अगर मनुष्य भी अपने भगवान की धुन में रमा रहे तो जीवन यात्रा बहुत आसान हो जाती है .


नंदी पवित्रता, विवेक , बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं . उनका हर क्षण शिव को ही समर्पित है और मनुष्य को यही शिक्षा देते हैं कि वह भी अपना हर क्षण परमात्मा को अर्पित करता चले तो उसका ध्यान भगवान अवश्य रखेंगे .


*राधे राधे .*🙏🙏

श्रीरुद्राष्टकम् ।। श्री गोस्वामितुलसीदासस्य ।।

 श्रीरुद्राष्टकम् ।। श्री गोस्वामितुलसीदासस्य ।।

 


नमामीशमीशान निर्वाणरूपं

विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं

चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।।1।।

 

हे ईशान! मैं मुक्तिस्वरूप, समर्थ, सर्वव्यापक, ब्रह्म, वेदस्वरूप, निज स्वरूप में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प, निरीह, अनन्त ज्ञानमय और आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त प्रभु को प्रणाम करता हूं।।1।।

 

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं

गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।

करालं महाकाल कालं कृपालं


गुणागार संसारपारं नतोऽहं।।2।।

 

जो निराकार हैं, ओंकाररूप आदिकारण हैं, तुरीय हैं, वाणी, बुद्धि और इन्द्रियों के पथ से परे हैं, कैलासनाथ हैं, विकराल और महाकाल के भी काल, कृपाल, गुणों के आगार और संसार से तारने वाले हैं, उन भगवान को मैं नमस्कार करता हूं ।।2।।

 

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं

मनोभूत कोटि प्रभा श्रीशरीरं।

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा

लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजंगा।।3।।

 

जो हिमालय के समान श्वेतवर्ण, गम्भीर और करोड़ों कामदेवों के समान कान्तिमान शरीर वाले हैं, जिनके मस्तक पर मनोहर गंगाजी लहरा रही हैं, भाल देश में बाल-चन्द्रमा सुशोभित होते हैं और गले में सर्पों की माला शोभा देती है।।3।।

 

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं

प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।

मृगाधीशचर्माम्बरं मुंडमालं



प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।।4।।

 

जिनके कानों में कुण्डल हिल रहे हैं, जिनके नेत्र एवं भृकुटि सुन्दर और विशाल हैं, जिनका मुख प्रसन्न और कण्ठ नील है, जो बड़े ही दयालु हैं, जो बाघ के चर्म का वस्त्र और मुण्डों की माला पहनते हैं, उन सर्वाधीश्वर प्रियतम शिव का मैं भजन करता हूं।।4।।

 

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं

अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।

त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं

भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।।5।।

 

जो प्रचण्ड, सर्वश्रेष्ठ, प्रगल्भ, परमेश्वर, पूर्ण, अजन्मा, कोटि सूर्य के समान प्रकाशमान, त्रिभुवन के शूलनाशक और हाथ में त्रिशूल धारण करने वाले हैं, उन भावगम्य भवानीपति का मैं भजन करता हूं।।5।।

 

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी

सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी।

चिदानन्द संदोह मोहापहारी


प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।।6।।

 

हे प्रभो! आप कलारहित, कल्याणकारी और कल्प का अंत करने वाले हैं। आप सर्वदा सत्पुरुषों को आनन्द देते हैं, आपने त्रिपुरासुर का नाश किया था, आप मोहनाशक और ज्ञानानन्दघन परमेश्वर हैं, कामदेव के शत्रु हैं, आप मुझ पर प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।।6।।

 

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं

भजंतीह लोके परे वा नराणां।

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं

प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।।7।।

 

मनुष्य जब तक उमाकान्त महादेव जी के चरणारविन्दों का भजन नहीं करते, उन्हें इहलोक या परलोक में कभी सुख तथा शान्ति की प्राप्ति नहीं होती और न उनका सन्ताप ही दूर होता है। हे समस्त भूतों के निवास स्थान भगवान शिव! आप मुझ पर प्रसन्न हों।।7।।

 

न जानामि योगं जपं नैव पूजां

नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यं।

जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं

प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो।।8।।

 

हे प्रभो! हे शम्भो! हे ईश! मैं योग, जप और पूजा कुछ भी नहीं जानता, हे शम्भो! मैं सदा-सर्वदा आपको नमस्कार करता हूं। जरा, जन्म और दुःख समूह से सन्तप्त होते हुए मुझ दुःखी की दुःख से रक्षा कीजिए।।8।।

 

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।

ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।

 🦋 हर हर महादेव, आप सभी को प्रणाम। महाशिवरात्रि की आप सभी को शुभ कामनाएं, भोलेनाथ आप सभी की मनोकामका पूर्ण करे🦋

Tuesday, February 20, 2024

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥

 श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।

अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥


श्रवण , कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन,वंदन,, दास्य, सख्य, और आत्मनिवेदन - इन्हें नवधा भक्ति कहते हैं ।



श्रवण---( परीक्षित)

           ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्त्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।


कीर्तन---(  शुकदेव)

         ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।


स्मरण---(प्रह्लाद)

          निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना।


पाद सेवन----(लक्ष्मी)

       ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना।


अर्चन-----(पृथुराजा)

              मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।


वंदन-----(अक्रूर)

         भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता-पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।


दास्य----( हनुमान)

          ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।


सख्य----(अर्जुन) 

            ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना।


आत्म निवेदन----(बलि राजा)

                 अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई हैं।


भगवान की नौ तरह से भक्ति के नाम और व्यावहारिक अर्थ ----


1-प्रथम भगति संतन्ह कर संगा । 

    

संतो का सत्संग - 

                   संत यानि सज्जन या सद्गुणी की संगति।


2-दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।

    

ईश्वर के कथा-प्रसंग में प्रेम - 

                            देवताओं के चरित्र और आदर्शों का स्मरण और जीवन में उतारना।


3- गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।

      

अहं का त्याग - 

                  अभिमान, दंभ न रखना। क्योंकि ऐसा भाव भगवान के स्मरण से दूर ले जाता है। इसलिए गुरु यानि बड़ों या सिखाने वाले व्यक्ति को सम्मान दें।


4- चौथी भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।

  

कपट रहित होना -

            दूसरों से छल न करने या धोखा न देने का भाव।


5.मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। 

   पंचम भजन सो बेद प्रकासा ॥

  

ईश्वर के मंत्र जप - 

              भगवान में गहरी आस्था, जो इरादों को मजबूत बनाए रखती है।


6. छठ दम सील बिरति बहु करमा । 

   

इन्द्रियों का निग्रह -

             स्वभाव, चरित्र और कर्म को साफ रखना।


7.सातवँ सम मोहि मय जग देखा ।


प्रकृति की हर रचना में ईश्वर देखना - 

                                दूसरों के प्रति संवेदना और भावना रखना,भेदभाव, ऊंच नीच से परे रहना।


8. आठवँ जथालाभ संतोषा।

     सपनेहूँ नहिं देखइ परदोषा।।


संतोष रखना और दोष दर्शन से बचना - 

                          जो कुछ आपके पास है उसका सुख उठाएं। अपने अभाव या सुख की लालसा में दूसरों के दोष या बुराई न खोजें। इससे आपवैचारिक दोष आने से सुखी होकर भी दु:खी होते है। जबकि संतोष और सद्भाव से ईश्वर और धर्म में मन लगता है।


9.नवम सरल सब सन छलहीना ।

     मम भरोस हियँ हरष न दीना ॥


ईश्वर में विश्वास - 

                    भगवान में अटूट विश्वास रख दु:ख हो या सुख हर स्थिति में समान रहना, स्वभाव को सरल रखना यानि किसी के लिए बुरी भावना न रखना, धार्मिक दृष्टि से स्वभाव, विचार और व्यवहार में इस तरह के गुणों को लाने से न केवल ईश्वर की कृपा मिलती है बल्कि सांसारिक सुख-सुविधाओं का भी वास्तविक आनंद मिलता है।

Friday, February 16, 2024

Ramcharit manas part-2

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*🚩🌹 भाग - 2  🚩🌹*


*🚩🕉️रामचरित मानस : कैकेयी निंदा की पात्र है या वंदना की*



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*🚩🕉️राम के वन गमन के पश्चात् भी कैकेयी भरत के लिए भी यही चाहती थी कि वह राजसिंहासन पर बैठ कर राज्य का संचालन न करे और य़ही हुआ। भरत ने राज कार्य तो संभाला लेकिन राजसिंहासन धारण न कर सिंहासन पर राम की चरण पादुका स्थापित कर राज्य का शासन कुशासन पर बैठ कर संचालित किया।*

 

*🚩🕉️भरत ने कुशासन पर बैठ कर अयोध्या को सुशासन दिया। संत का मानना है कि राम की चौदह साल की वनवास की अवधि मे एक भी मौत नहीं हुई।* 

 

*🚩🕉️इतनी ज्ञानवान और गुणवान और राम को भरत से भी अधिक प्रेम करने वाली कैकेयी ने कुटिल मंथरा के बहकावे में कैसे आ गई।*

 

*🚩🕉️संत का कहना था कि आप मानस का गंभीरता के साथ अध्ययन करें, मानस का सिर्फ परायण ही पर्याप्त नहीं है। मंथरा की कुटिल बातें सुन कर कैकेयी ने क्या कुछ नहीं कहा ‘पुनि अस कबहुँ कहसी घरफोरि, तब धरि जीभ कढ़ावहु तोरि’ और फिर तुलसी ने एक दोहे कैकेयी के मुख से यह कहलवाया “काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि, तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।*

 

*🚩🕉️इसके अलावा कैकेयी के चरित्र के संदर्भ कोई राय बनाने के पूर्व देवताओं और सरस्वती की भूमिका पर भी तो विचार किया जाना चाहिए। यह प्रसंग रामायण का थोड़ा भी ज्ञान रखने वाले सबको ज्ञात है इसलिए दोहराने की आवश्यकता नहीं।*


*🚩🕉️ऐसी परिस्थिति से घिर कर ही तो कैकेयी को ऐसे दो वरदान मांगने पड़े जिनके चलते वह हर काल और युग में एक कलंकिनी के रुप मे ही परिभाषित होती रही। अपने जिस पुत्र भरत के लिए राज्य मांगा उसी पुत्र से कैकेयी को कितनी लांछना भोगनी पड़ी यथा ....*

 

*🚩🕉️जौ पै कुरुचि रही अति तोहि, जनमत काहे न मारे मोहि। भरत ने अपनी माता के प्रति जैसे कुवचन पापिनि सबहिं भांति कुल नासा .... कहे उनको भी कैकेयी रघुवंश की सुरक्षा के लिए सहन कर गई। भरत ने इस चौपाई में तो एक मां के प्रति वांछित किसी मर्यादा का ख्याल नहीं रखा .......*

 

*🚩🕉️जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ, खंड खंड होई हृदउ न गयऊ ।।*

*बर मागत मन भइ नहिं पीरा, गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ।।*

 

*इन शब्दों  में भरतजी कैकेयी की घोरतम निंदा करते हैं। भगवान राम ने भरतजी को चित्रकूट में कैकेयी की इस तरह कठोरतम निंदा करने रोका तो भरतजी ने कहा कि मैं अकेला कैकेयी की निंदा नहीं कर रहा हूं बल्कि ‘जननी कुमति जगतु सबु साखी’’ यहां तक कि निषादराज की दृष्टि में भी कैकेयी का चरित्र भी ऐसा ही है .... यथा*

 

*🚩🕉️कैकेयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनुकीन्ह*

 

*🚩🕉️लेकिन श्रीराम इस तरह के किसी मत से सहमत नहीं जान पड़ते।*


*🚩🕉️राम कहते हैं “ दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई , जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई*

 

*🚩🕉️मानस का गहन अध्ययन करने पर यही कहना पड़ता है कि कैकेयी निंदनीया है या वंदनीया इस पर मंतव्य देना कोई आसान नहीं है।*

 

*🚩🕉️क्योंकि कैकेयी की प्रसंशा करने वाला तुलसी का पात्र इतना महान है कि अनुचित नहीं माना जा सकता और वह पात्र है मानस का महा नायक राम। दूसरी ओर कैकेयी की निंदा करने वाले हैं भरत और उनका चरित्र भी इस तरह चित्रित किया गया है कि हम यह नहीं कह सकते कि वे गलत हैं।*

 

*🚩🕉️कुल मिला कर रामायण में परिस्थितियां इस तरह रची गई है कि तुलसी ने मूर्त रुप से भले ही निंदनीया के रुप में प्रस्तुत किया है लेकिन कैकेयी के दो वरदान के परिणामों पर जाए तो वे वंदनीया ही हैं।* 

 

*🚩🕉️मैथिली

 के शब्दों मे स्वयं कैकेयी स्वीकार करती है---*

 

*“🚩🕉️क्या कर सकती थी मरी मंथरा दासी, मेरा मन ही रह सका ना निज विश्वासी”।*


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